Top 100 Breakup Status in Hindi

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Top 100 Breakup Status in Hindi

Top 100 Breakup Status in Hindi

 

'ज़िंदगी' से "सिकवा" नहीं की उसने... 

'गम' का आदि बना दिया! 

'गिला' तो उनसे हैं जिन्होंने... 

'रोशनी' की "उम्मीद" दिखा के "दीया" ही 'बुझा' दिया! 

 

याद है मुझे मेरी 'गलती' एक तो 'मोहब्बत' कर ली... 

दूसरी "तुझ" 'बेवफा' से कर ली... 

और तीसरी कि... "बेपनाह" कर ली! 

 

सुना है "वो" 'कह' कर गये है के अब तो हम... 

सिर्फ़ 'तुम्हारे ख्वाबों' में ही आएँगे... 

कोई कह दे 'उनसे' की वो 'वादा' कर ले हमसे... 

ज़िंदगी भर के लिए 'हम' "सो" जायेंगे! 

 

तुम आए 'ज़िंदगी' मे 'कहानी' बन कर... 

तुम आए 'ज़िंदगी' में 'रात की चाँदनी' बन कर... 

बसा लेते है जिन्हे हम 'आँखो' में... 

वो अक्सर 'निकल' जाते है 'आँखो' से 'पानी' बनकर! 

 

मेरी साँसों की 'डोर' बस "दो" ही... 'ख्वाहिशों' पर 'टिकी' है... 

साँस चले तो 'तुम' साथ हो... "साँस रुके" तो 'तुम' पास हो! 

 

"प्यास" तो 'मर' कर भी नहीं 'बुझती ज़माने' की... 

"मुर्दे" भी जाते जाते "गंगाजल" का 'घूँट' मांगते है! 

 

'वो' मेरी "जान" है ये मुझको 'पता' है... ग़ालिब... 

'ख़ाक' हो जाऊंगा मैं... उसको "खबर" होने तक! 

 

ऐ 'हवा' तु उधर तो 'जाती' होगी... 

मेरे "दिल" का हाल तो उन्हे 'बताती' होगी... 

ज़रा छू कर देख मेरे 'महबूब' के "दिल" को... 

क्या उन्हें मेरी 'य़ाद' आती होगी! 

 

हर किसी का "दिल" 'टुटा' मिला "इश्क़" और "प्यार"में... 

कोई तो होगा जो सिर्फ खुश होगा ऐ "इश्क़" तेरी 'कतार' में! 

 

ना 'मुस्कुराने' को जी 'चाहता' है... 

ना 'आंसू' "बहाने" को जी 'चाहता' है... 

लिखूं तो 'क्या लिखूं' ? तेरी 'याद' में... 

बस तेरे पास 'लौट' आने को जी 'चाहता' है! 

 

तुम्हारे 'ग़लत' कहने से मेरा 'सही ग़लत' नहीं होता... 

काश 'तुम' भी सही होते तो कुछ भी 'गलत' नहीं होता! 

 

ना हम रहे "दिल" लगाने के क़ाबिल... 

ना "दिल" रहा 'गम' उठाने के क़ाबिल... 

लगा 'उसकी यादों' से जो ज़ख़्म "दिल" पर... 

ना छोड़ा उस ने 'मुस्कुराने' के क़ाबिल! 

 

आज कह तो दिया 'दिल पर पत्थर' रख कर... 

नहीं करता मैं "प्यार" कैसे समझाऊँ कि उस 'नादान' को... 

इस "दिल" मेेे तेरे 'सिवा' कोई नहीं! 

 

एक ही 'जख्म' नहीं सारा वजूद ही 'जख्मी' है...

दर्द खुद भी 'हैरान' है कि उठूं तो कहां से उठूं! 

 

बेहोश होकर बहुत भी 'जल्द' तुझे 'होश' आ गया... 

मैं 'बदनसीब' होश मे होकर भी 'होश' में आया नही अभी तक! 

 

उसके "दिल" मे थोडी सी 'जगह' माँगी थी 'मुसाफिर' की तरह... 

उसने तो 'तन्हाईयों' का 'पूरा शहर' ही 'मेरे ऩाम' कर दिया! 

 

कभी 'ग़म' से "दिल" लगाया तो कभी 'अश्क' के सहारे तो... 

कभी 'रात' गुजारी "रो" के तो कभी 'गिन' के "चाँद-तारे"! 

 

भरने को तो हर 'ज़ख्म' भर जायेंगे...

कैसे 'भरेगी' वो जगह जहां तेरी 'कमी' होगी! 

 

वाह रे 'मोहब्बत' बहुत जल्दी 'ख्याल' आया मेरा... 

बस भी करो "चूमना" अब उठने दो 'जनाजा' मेरा! 

 

ज़ख़्म दे कर "ना" पूछा करो 'दर्द' की तुम शिद्दत... 

दर्द तो 'दर्द' होता है थोड़ा क्या और ज्यादा क्या! 

 

छोड़ दो 'उसकी वफा' की आस वो 'रुला' सकता है... 

तो वो 'भुला' भी सकता है! 

 

उन्हें 'चाहना' हमारी 'कमजोरी' है... 

उनसे कह नहीं पाना हमारी 'मजबूरी' है... 

वो क्यूँ नही समझते हमारी 'खामोशी' को... 

क्या "प्यार" का 'इज़हार' करना जरूरी है! 

 

अंदर से तो कब के 'मर' चुके है हम... 

ऐ "मौत" तू भी आजा लोग 'सबूत' मांगते हैं! 

 

ये क्या 'सितम' है‍ क्यूं रात भर 'सिसकता' है... 

वो कौन है जो "दीयों' में 'जला' रहा है मुझे! 

 

नाराज़ क्यों होते हो चले जाएंगे 'तुम्हारी ज़िन्दगी' से दूर... 

जरा टूटे दुए 'दिल के टुकड़े' उठा लेने दो! 

 

जिंदगी तो हमेशा से ही... 

बेवफा और 'ज़ालिम' होती है मेरे दोस्त... 

बस एक 'मौत' ही 'वफादार' होती है... 

जो हर किसी को मिलती है!  

 

दिले 'ख्वाहिश' जनाब कोई 'उनसे' भी तो पूछे...

ख्वाहिश में जरुर "वो" 'मेरी मौत' ही मांगेंगे देखना! 

 

यूँ तो 'हादसों में गुजरी' है हमारी ज़िंदगी...

हादसा ये भी 'कम' नहीं कि हमें 'मौत' ना मिली! 

 

दुआ करना "दम" भी उसी दिन निकले... 

जिस दिन 'तेरे' "दिल" से हम निकले! 

 

कोशिश तो "बहुत" करता हूँ पर अब... 

किसी से "तुम्हारे" जैसी" मोहब्बत" नहीं होता है! 

 

इस 'दुनिया' में सब कुछ 'बिकता' है... 

फिर 'जुदाई' ही "रिश्वत" क्यों नही लेती? 

मरता नहीं है कोई 'किसी से जुदा' होकर... 

बस 'यादें' ही हैं जो 'जीने' नहीं देती!  

 

"रुलाने" वाले आख़िर हमें 'रुला' देंगे...

"जहर" देके 'गहरी नींद' सुला देंगे...

फिर भी कोई 'गम' ना होगा हमें...

"दर्द" तो तब होगा जब आप हमें 'भुला' देंगे! 

 

उनका भी कभी हम 'दीदार' करते हैं... 

उनसे भी कभी हम 'प्यार' करते हूँ... 

क्या करे जो उनको 'हमारी जरुरत' न थी... 

पर फिर भी हम 'उनका इंतज़ार' करते हैं! 

 

हर बात में 'आंसू बहाया' नहीं करते... 

"दिल की बात" हर किसी को 'बताया' नहीं करते... 

लोग "मुट्ठी में नमक" लेके 'घूमते' हैं... 

दिल के "जख्म" हर किसी को 'दिखाया' नहीं करते! 

 

आपसे दूर रह के भी 'आपको याद' किया हमने... 

रिश्तों का 'हर फ़र्ज़ अदा' किया हमने... 

मत सोचना की 'आपको भुला' दिया हमने... 

आज फिर 'सोने' से पहले 'आपको याद' किया हमने! 

 

"इंतज़ार" रहता है हर 'शाम' तेरा... 

राते कटती है लेकर 'नाम ' तेरा... 

"मुद्दत" से बैठा हूँ 'पाल' के ये आस... 

कभी तो आएगा 'कोई पैग़ाम' तेरा! 

 

वो 'नदियाँ' नहीं 'आंसू' थे मेरे... 

जिस पर वो 'कश्ती' चलाते रहे... 

मंजिल मिले उन्हें यह 'चाहत' थी मेरी... 

इसलिए 'हम आंसू' बहाते रहे!  

 

नशे की 'आदत' तेरी 'आँखों' ने लगाई है... 

वरना कभी हम भी 'होश में जिया' करते थे! 

 

मेरे "दिल" ने जब भी कभी कोई "दुआ" माँगी है... 

तब 'तुझे माँगी' और तेरी "वफ़ा" माँगी है... 

जिस "प्यार" को देख के दुनियावाले 'जला' करते हैं... 

तेरी "मोहब्बत" करने की वो 'प्यारी' अदा माँगी! 

 

आज किसी की 'दुआ' की कमी है... 

तभी तो 'हमारी आँखों' में नमी है... 

कोई तो है जो 'भूल' गया हमें... 

पर हमारे "दिल" में उसकी 'जगह' वही है! 

 

उस 'अजनबी' का यूँ न 'इंतज़ार' करो... 

इस "आशिक दिल" का न 'ऐतबार' करो... 

रोज़ 'निकला' करें किसी के 'याद' में आंसू... 

इतना न कभी किसी से 'प्यार' करो! 

 

ठहर सी जाती है 'जिंदगी' जब कोई अपना "जुदा" होता है... 

ये "दिल" है 'मुश्किल' कहकर ये "दिल" 'खुद रो' लेता है!  

 

करीब आने की 'ख्वाहिशें' तो बहुत थी मगर... 

करीब आकर 'पता चला' की "मोहब्बत" तो 'फासलों' में है! 

 

बोतल पे बोतल 'पीने' से क्या 'फायदा' मेरे दोस्त... 

रात गुजरेगी तो 'उतर' जाएगी पीना है तो... 

सिर्फ 'एक बार' किसी की "बेवफाई" पियो... 

"खुदा की कसम" 'उम्र' सारी 'नशें' में गुजर जाएगी! 

 

काश वो 'नगमें' सुनाये ना होते आज 'उनको सुनकर' ये... 

'आंसू' आये 'ना' होते! 

अगर इस तरह 'भूल' जाना ही था... 

तो इतनी 'गहराई' से "दिल" में समाये ना होते! 

 

'शबनम' से क्या "फूल" खिले जब तक 'बरसात' न हो... 

'तेरे तस्वीर' से क्या "दिल" भरे जब तक 'मुलाकात' न हो! 

 

खामोश तुम्हारी "नजरों" ने एक काम 'गजब' का कर डाला... 

पहले थे हम "दिल" से 'तन्हा' अब "खुद" से ही 'तन्हा' कर डाला! 

 

सुनों जब तक 'तुम साथ' थे तब तक 'जिन्दा' था मैं... 

अब तो 'चलते फिरत' लाश हूँ, धुआं हूँ, राख हूँ मैं! 

 

जिस 'शख्स' को हमारी 'ज़रुरत' ही नहीं थी... 

हम 'उस शख्स' को अपनी "आरजू" बना के 'रोये' हैं! 

 

"शतरंज" का 'शौकीन' नहीं था इसलिए 'धोखा' खा गया... 

वो 'मोहरे' चल रहे थे मैं 'दोस्ती' "समझ" रहा था! 

 

दुनिया में 'किसी से' कभी "प्यार" मत करना... 

अपने 'अनमोल आँसू' इस तरह "बेकार" मत करना... 

'कांटे' तो फिर भी दामन 'थाम' लेते हैं... 

'फूलों' पर कभी इस तरह 'तुम ऐतबार' मत करना! 

 

लोग पूछते है 'कौन' है? जो तेरी ये 'हालत' कर गया... 

मैं 'मुस्कुराते' हुए कहता हूँ... 

'उसका नाम' हर किसी के "लब" पर 'अच्छा' नही लगता! 

 

लोग कहते हैं किसी "एक" के चले जाने से... 

'जिन्दगी अधूरी' नहीं होती है लेकिन... 

'लाखों' के 'मिल' जाने से उस "एक" की 'कमी पूरी' नहीं होती है! 

 

ख़ुशी मेरी 'तलाश' में 'दिन रात' यूँ ही 'भटकती' रही... 

कभी उसे मेरा 'घर' ना मिला कभी उसे हम 'घर' पे ना मिले! 

 

वो तो 'दिवानी' थी मुझे 'तन्हां ' छोड़ गई... 

खुद न 'रुकी' तो अपना 'साया' छोड़ गई... 

दुख न सही 'गम' इस बात का है... 

आँखों से करके 'वादा' होंठो से 'तोड़' गई! 

 

एक सपने की तरह तुझे "सज़ा" के रखूं... 

'चाँदनी रात' की 'नज़रों' से "छूपा" के रखूं... 

मेरी "तक़दीर" में 'तुम्हारा' साथ नहीं...

वरना सारी "उम्र" तुझे 'अपना' बना के रखूं! 

 

साहिल पर खड़े-खड़े हमने 'शाम' कर दी... 

अपना "दिल" और 'दुनिया' आप के नाम कर दी... 

ये भी न सोचा कैसे 'गुज़रेगी' ज़िंदगी... 

बिना सोचे-समझे हर "ख़ुशी" आपके 'नाम' कर दी! 

 

ये "इश्क" का 'कलमा' है जरा 'सहम' के पढ़ना... 

ख्वाबों से 'खेलना' कहीं "आदत" ना बन जाए! 

 

दर्द "रगड़ना" पड़ता है 'चिंगारी' होने तक... 

एक 'शायर' "टूट" जाता है 'शायरी' होने तक! 

 

रोकने की 'कोशिश' तो बहुत की "पलकों" ने मगर... 

"इश्क" में 'पागल' थे 'आँसू ख़ुदकुशी' करते चले गए! 

 

जिंदगी बड़ी 'अजीब' सी हो गयी है, जो 'मुसाफिर' थे... 

वो रास नहीं आये, जिन्हें 'चाहा' वो 'साथ' नहीं आये! 

 

इस 'डूबते हुए सूरज' से 'उम्मीदें' ही क्या थीं... 

हँस-हँस के 'सितारों' ने भी "दिल" तोड़ दिया है! 

 

तेरी 'दोस्ती' ने दिया 'सुकून' इतना...

की 'तेरे' बाद कोई 'अच्छा' न लगे...

तुझे करनी है 'बेवफ़ाई' तो इस अदा से कर...

कि 'तेरे' बाद कोई भी 'बेवफ़ा' न लगे! 

 

क्यों 'भीगता' रहता हूँ हर पल... 

कौन है मुझमें जो 'रोया' करता है! 

 

अब ना रहेगा "इंतज़ार" मेरे 'महबूब' का मुझे... 

मैंने 'मौत' को "एक ख़त" 'लिखकर भेजा' है अभी-अभी! 

 

सीखते रहे 'उम्र' भर 'लहरों' से "लड़ने का हुनर"... 

हमें कहाँ 'पता' था कि 'किनारे' ही "कातिल" निकलेंगे! 

 

'अज़ीब खेल' है 'मिट्टी' से बने लोगों का... 

'बेवफ़ाई' करो तो 'रोते' हैं और "वफ़ा" करो तो 'रुलाते' हैं!  

 

"खुदा" 'बदनाम' ना हो... 

इस वास्ते 'गुनाह' करने होंगे मुझे! 

 

हम 'गमों' को 'छिपाने' का 'कारोबार' करते हैं... 

कसूर बस इतना है की हम 'गम' देने वाले से ही 'प्यार' करते हैं! 

 

तुम फिर "आ" गये मेरी 'शायरी' में... 

क्या करूँ? न मुझसे 'शायरी' "दूर" जाती है... 

न मेरी 'शायरी' से... तुम!  

 

तेरी एक 'झलक' पाने को 'तरस' जाता है " दिल" मेरा... 

'खुश किस्मत' हैं वो लोग जो "तुझे" हर रोज 'देखते' हैं! 

 

मालूम है मुझे की ये 'मुमकिन' नहीं मगर... 

एक 'आस' सी रहती है कि तुम 'याद' करोगी! 

 

न वो 'सपना' देखो जो 'टूट' जाये... 

न वो 'हाथ' थामो जो 'छूट' जाये... 

मत आने दो किसी को 'करीब' इतना... 

कि उसके 'दूर' जाने से 'इंसान' खुद से 'रूठ' जाये! 

 

मुझे भी 'शामिल' करो 'गुनहगारों' की "महफ़िल" में यारों... 

मैं भी 'क़ातिल' हूँ मैंने भी अपनी 'ख्वाहिशों' को "मारा" है! 

 

मेरे "मुस्कराते चेहरे" को देख 'तुम' क्या समझोगे... 

मुझे तो 'वो' नहीं 'समझ' पाया... 

जिसने 'मुझे' "मुस्कराना" सिखाया! 

 

सुनो आज 'आखिरी' बार 'अपनी बाहों' में "सुला" लो, अगर... 

आंख 'खुले' तो "उठा" देना वरना 'सुबह' "दफना" देना! 

 

"इश्क" हुआ है 'तुमसे' बस यही 'खता' है... 

मेरी तू "मोहब्बत" है और तू ही "कमजोरी" है मेरी! 

 

टूटे हुए 'सपनों' और छुटे हुए 'अपनों' ने मार दिया... 

वरना "ख़ुशी" खुद 'हमसे' "मुस्कुराना" 'सिखने' आया करती थी! 

 

यह कह कर मेरा 'दुश्मन' मुझे "हँसता" छोड़ गया कि... 

तेरे "अपने" ही बहुत हैं तुझे 'रुलाने' के लिए! 

 

जाते हुए "उसने" सिर्फ इतना 'कहा' मुझसे... अरे 'पागल'... 

अपनी 'ज़िंदगी' 'जी' लेना वैसे "प्यार" 'अच्छा' करते हो!  

 

ऐ जिंदगी मुझ पे हैं "सैकड़ों इल्ज़ाम" मेरे 'साथ' न चल...

तू भी हो जाएगा "बदनाम" मेरे 'साथ' न चल! 

 

"दिल" 'जलाने' की 'आदत' अभी गई नहीं तुम्हारी... 

"फूल" आज भी तुम 'बगल' वाली "कब्र" पर रख जाते हो! 

 

मुझको 'ज़ख़्मी' नहीं कर सकता कोई "दर्द ऐ सितम"... 

मैं "नदी" का 'चाँद' हूँ... "पत्थर" नहीं लगता मुझे! 

 

तेरे लिये ये "दिल" 'उदास' क्यों है मेरी 'आंखों' में ये 'प्यास' क्यों है... 

जो छोड गया तुझे 'मझधार' में उससे मिलने की 'आस' क्यों है... 

दे गया जो "गम" 'जिन्दगी' भर का ऐ दिले नादान... 

वो ही 'तेरे' लिये "खास" क्यों है! 

 

"दिल लगाना" छोड़ दिया हमने... 

"आँसू" 'बहाना' छोड़ दिया हमने... 

बहुत खा चुके 'धोखा' "प्यार" में... 

"मुस्कुराना" इसलिए 'छोड़' दिया हमने! 

 

"नशा" हम किया करते हैं और... 

"इल्जाम" 'शराब' को दिया करते हैं... 

कसूर "शराब" का नहीं उनका है... 

जिनका "चेहरा" हम 'जाम' में "तलाश" किया करते है! 

 

"तक़दीर" लिखने वाले एक 'एहसान' कर दे... 

"मेरे दोस्त" की 'तक़दीर' में एक और 'मुस्कान' लिख दे... 

ना मिले कभी 'दर्द' उनको तू चाहे तो... 

उसकी 'किस्मत' में "मेरी जान" लिख दे! 

 

हथेलियों पर 'मेहँदी' का “ज़ोर” ना डालिये... 

दब के 'मर' जाएंगी “मेरे नाम” की 'लकीरें'! 

 

'मंज़िलें' मुझे छोड़ गयी 'रास्तों' ने "संभाल" लिया है... 

जा "जिन्दगी" 'तेरी जरूरत' नहीं मुझे हादसों ने 'पाल' लिया है! 

 

कितना और 'दर्द' देगा बस इतना 'बता' दे... 

ऐसा कर ऐ "खुदा" 'मेरी हस्ती' मिटा दे... 

यूँ 'घुट-घुट' के 'जीने' से "मौत" बेहतर है... 

मैं कभी न 'जाग' सकूं मुझे ऐसी 'नींद' सुला दे! 

 

लब तो 'खामोश' रहेंगे ये "वादा" है मेरा 'तुमसे'... 

अगर "कह" बैठी कुछ 'निगाहें' तो "खफा" मत होना! 

 

बस यही 'सोच' कर तुमसे "नज़र" मिला ली है कि... 

नये 'ज़ख़्मों' के लिए इस "दिल" में 'जगह ख़ाली' है! 

 

दर्द की 'परतें' जब "खोल" कर देखी तब पाया कि... 

उसमें "रूह" तक 'निकलने' का "रास्ता" नहीं था! 

 

मेरी "चाहत" को 'मेरी हालत' के 'तराजू' में ना तोल... 

मैंने वो "जख्म" भी खाये हैं जो मेरी 'किस्मत' में नहीं थे! 

 

मेरी "तबाही" का 'इल्जाम' अब "शराब" पर है... 

करता भी क्या... 'तुम' पर जो "बात" आ रही थी! 

 

तुझे "किस्मत" समझ कर 'सीने' से लगाया था...

भूल गए थे की "किस्मत" बदलते 'देर' नहीं लगती है! 

 

ज़िंदगी में अगर 'तुम' "अकेले" हो तो "प्यार" करना "सीख" लो... 

और "प्यार" कर लिया है तो "इज़हार" करना भी "सीख" लो... 

अगर "इज़हार" करना नहीं "सीखा" तो... 

ज़िंदगी भर "प्यार" के 'यादों' में "रोना" 'सीख' लो! 

 

"सीखना" होगा चिराग़ों की 'हिफाज़त' करना... 

"आँधियों" का तो 'इरादा' नहीं बदल सकते! 

 

अक्सर लोग 'पूछते' हैं किसके लिए "लिखते" हो और...  

हर बार 'दिल' कहता है 'काश' "कोई" होता! 

 

काश तू मेरी आँखों का 'आँसू' बन जाए...  

मैं 'रोना' ही छोड़ दूँ तुझे 'खोने के डर' से! 

 

हमारी 'खामोशी' पर 'मत' जाओ... 

राख के नीचे अक्सर 'आग' दबी होती है! 

 

आईना फैला रहा है 'खुदफरेबी' का ये मर्ज... 

हर किसी से 'कह' रहा है "आप" सा कोई नहीं! 

 

उतार दो 'कर्ज़' हमारी "मोहब्बत" का हमे बाहों में ले के... 

वरना 'जुदाई के ग़म' में 'मर' जायेंगे "तुम्हारा नाम" ले के! 

 

दिल ही दिल में "गम" 'सहना' सीख लिया... 

"दर्द" में भी 'चुप' रहना सीख लिया... 

छलकती नहीं अब ये 'आँखें' किसी के भी सामने... 

इन 'आँखों' ने भी अब "अकेले" में 'बहना सीख' लिया!