Top 100 Breakup Shayari in Hindi

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Top 100 Breakup Shayari in Hindi

Top 100 Breakup Shayari in Hindi

 

जिस्म 'सौंप' देने से अगर "मोहब्बत" बढ़ती तो…  

सबसे ज्यादा "आशिक़" एक "वैश्या" की होती!

 

कभी देखेंगे ऐ 'जाम' तुझे 'होठों' से लगाकर...

तू 'मुझमें' उतरता है... कि मैं 'तुझमें' उतरता हूँ!

 

आकाश मे डूबा एक 'प्यारा तारा' है... 

हमको तो किसी की 'बेवफ़ाई ने मारा' है...

हम उनसे अब भी 'मोहब्बत' करते हैं...

जिसने हमे 'मौत' से भी पहले 'मारा' है!

 

इल्मो 'अदब' के सारे 'खज़ाने' गुज़र गए... 

क्या "खूब" थे वो लोग 'पुराने गुज़र' गए...

बाकी है जमीं पे 'फ़कत आदमी' की भीड़...

इंसान को 'मरे' हुए तो 'ज़माने गुज़र' गए!

 

तबाह हूँ तेरे "प्यार" में तुझे दूसरों का 'ख़याल' है... 

कुछ मेरे 'मसले' पर भी 'गौर' कर...

मेरी 'जिन्दगी का सवाल' है! 

 

इंसान के "कंधों" पर 'इंसान' जा रहा था... 

कफ़न में लिपटा "अरमान" जा रहा था...

जिन्हें मिली 'बेवफ़ाई' "मोहब्बत" में...

वफ़ा की 'तलाश' में "श्मशान" जा रहा था! 

 

"इश्क" का होना भी लाजमी है "शायरी" के लिये...

"कलम" लिखती तो दफ्तर का बाबू भी "ग़ालिब" होता!

 

लाज़िमी है मेरा "बेमिसाल" होना... 

एक तो "मैं ख़्याल" हूँ और वो भी "तुम्हारा"!

 

मेरे तो "दर्द" भी औरों के "काम" आते हैं... 

मैं "रो" पडूँ तो कई लोग "मुस्कराते" हैं!

 

"नसीब" ने पूछा... बोल "क्या चाहिए"...

"ख़ुशी" क्या मांग ली "खामोश" हो गया! 

 

"मोहब्बत" मिलने पर कहाँ "मोहब्बत समझ" आती है... 

मोहब्बत तो तब समझ आती है जब...

दिल की "तड़प हद" से 'गुजर' जाती है!

 

'फिक्र' बता रही है "मोहब्बत जिन्दा" है...

'फासलों' से कह दो "गुरूर ना" करे!

 

किताब की तरह "शख्सियत" है मेरी...

बाहर से "शांत" हूँ मगर अंदर "अल्फाज" बहुत है!

 

आपकी "चाहत" हमारी 'कहानी' है... 

ये 'कहानी' इस "वक़्त की मेहरबानी" है... 

हमारी "मौत" का तो पता नहीं... 

पर हमारी ये "ज़िंदगानी" सिर्फ "आपकी दीवानी" है! 

 

कभी करते हैं "ज़िंदगी की तमन्ना"... 

तो कभी "मौत का इंतज़ार" करते हैं... 

वो हमसे क्यों "दूर है पता" नहीं... 

जिन्हे हम "ज़िंदगी" से भी "ज़्यादा प्यार" करते हैं! 

 

वो समझे या ना समझे मेरे "जज्बात" को... 

मुझे तो मानना पड़ेगा उनकी "हर बात" को... 

हम तो "चले जायेंगे दुनिया" से एक दिन... 

मगर देख लेना "वो सोयेंगे" अकेले "हर रात" को! 

 

उनकी "यादों को प्यार" करते हैं...

लाखो जनम उन पर "निसार" करते हैं...

अगर "राह" में मिले वो आपसे... 

तो कहना उनसे हम आज भी उनका "इंतज़ार" करते हैं! 

 

रोकने की कोशिश तो बहुत की 'पलकों' ने, मगर...

इश्क में 'पागल' थे आँसू 'ख़ुदकुशी' करते चले गए!

 

कभी तो कोई "ख़ुशी" 'चखा' कर ऐ ज़िंदगी...

तुझसे किसने 'कह' दिया के "हमारा रोज़ा' है!

 

मैं फिर से निकलूंगा... 'तलाश' ऐ-जिन्दगी में...

"दुआ" करना 'दोस्तों' इस बार किसी से 'इश्क' ना हो!

 

चिराग कैसे अपनी 'मजबूरियाँ' बयाँ करे...

हवा 'जरूरी' भी और 'डर' भी उसी से है!

 

हमारे पास तो सिर्फ 'तेरी यादे' है... 

जिंदगी तो उसे 'मुबारक' हो जिसके पास 'तुम' हो!

 

हर "खामोशी" का मतलब 'इंकार' नहीं होता...

हर "नाकामयाबी" का मतलब 'हार' नहीं होता...

तो क्या हुआ अगर "हम" 'तुम्हें' न पा सके...

सिर्फ 'पाने' का मतलब "प्यार" नहीं होता!

 

बहुत दिनों बाद 'स्कूल' के सामने से 'निकले' तो स्कूल ने पूछा...

मुझसे तो 'तुम परेशान' थे अब ये बताओ...

'जिन्दगी' के 'इम्तिहान' कैसे चल रहे हैं!

 

मेरा 'वजूद खत्म' हुआ...

अब सिर्फ 'सांसें' चलती है...

इश्क़ का 'जनाज़ा' तुम भी देख लो...

सच्ची "मोहब्बत" कैसे 'जलती' है!

 

हम तो 'पागल' हैं जो 'शायरी' में ही 'दिल की बात' कह देते हैं...

लोग तो 'गीता पर हाथ' रखकर भी 'सच' नहीं बोलते हैं!

 

मेरे पाँव के 'छालों' जरा 'लहू' उगलो...

जमाना मुझसे मेरे 'सफर के निशान' माँगेगा!

 

खामोश हूँ बहुत कुछ दफन' है मेरे अंदर...

मेरे 'दर्द' को 'हवा' लगी तो 'कयामत' होगी!

 

ये गलत है कि हम 'वफादार' नहीं हैं...

सच तो ये है के हम 'अदाकार' हैं!

 

'हमारे इश्क' की तो बस इतनी सी 'कहानी' है...

तुम बिछड़' गए... हम 'बिखर' गए...

'तुम' 'मिले' नहीं और "हम किसी और के हुए" नहीं! 

 

तुम्हें 'मनाने' में ये भी 'सितम' उठाना था...

वहां वहां भी 'गए' हैं जहां 'ना जाना' था! 

 

'रिश्ता' उन से मेरा इस कदर 'बढ़ने' लगा...

वो 'मुझे पढ़ने' लगे हम उन्हें 'लिखने' लगे!

 

उसने 'मेरी हथेली' पर 'अपनी नाज़ुक' सी 'ऊँगली' से लिखा...

"मुझे प्यार है तुमसे"

न जाने कैसी "स्याही" थी की वो 'लफ्ज़ मिटे' भी नहीं और...

आज तक 'दिखे' भी नहीं!

 

उलझी "शाम" को पाने की 'ज़िद' न करो...

जो ना हो 'अपना' उसे "अपनाने" की 'ज़िद' न करो...

इस 'समंदर' में "तूफ़ान" बहुत आते हैं...

इसके साहिल पर "घर" बनाने की 'ज़िद' न करो!

 

मोहब्बत की महफ़िलों में "खुदगर्ज़ी" नहीं चलती... 

कम्बख़त मेरे ही "दिल" पर 'मेरी मर्जी' नहीं चलती! 

 

जब "तू" मिला तो 'एक ज़िन्दगी' का "किस्सा" बन गया...

वो कौन-सा 'पल' था जिसका "तू हिस्सा" बन गया...

कुछ लोग 'ज़िंदगी' मे ऐसे "बस" जाते हैं...

जो अगर न मिले तो जैसे 'ज़िदंगी' बस "एक किस्सा" बन गया!

 

कोई उसे "खुश" करने के 'बहाने ढूंड' रहा था... 

मैने कहा- उसे 'मेरे मरने' की "खबर सुना" दे!

 

"इश्क़" 'चख' लिया था इत्तफ़ाक़ से... 

"ज़ुबान" पर आज भी 'दर्द के छालें' हैं!

 

तेरे 'प्यार' ने हमें "हंसना" सिखाया...

तेरे 'प्यार' ने हमें बहुत "रुलाया"... 

"प्यार" में "पागल" लोग दुनिया "भूल" जाते हैं...

तेरे प्यार में हमने "अपने आप" को भुलाया! 

 

हमने खुशियोँ की पूरी "तिजोरी" उनके हवाले कर दी थी...

लेकिन कमबख्त को सिर्फ मेरी "हंसी" ही 'चुरानी' थी! 

 

तेरे होने तक मैं "कुछ" तो था…

तेरा हुआ तो मैं "बर्बाद" हो गया! 

 

कभी 'तुम' मुझे "अपना" तो कभी "गैर" कहते गये...

पर देखो मेरी "नादानी"... 

हम सिर्फ 'तुम्हे' "अपना" कहते गये! 

 

वाक़िफ़ कहाँ "ज़माना" हमारी "उड़ान" से...

वो और थे जो "हार" गए "आसमान" से!  

 

"दिल" की बात "छुपाना" आता नहीं...

किसी का दिल "दुखाना" आता नहीं... 

आप सोचते है हम 'भूल' गए आपको... 

पर कुछ अच्छे "दोस्तों" को "भूलना" हमको आता नहीं! 

 

"उम्मीद" कभी हमें 'छोड़' कर नहीं जाती... 

"जल्दबाजी" में 'हम' ही "उसे" 'छोड़' देते हैं!

 

करवटें सिसकियाँ 'कशमकश' और 'बेताबी'...

कुछ भी कहो... "मोहब्बत" 'आग' लगा देती है!

 

'तेरा' साथ ना छूटे बस "दुआ" है मेरी...

'तेरा' ख़याल ना छूटे बस "दुआ" है मेरी...

रूठे चाहे "रब" मेरा मुझसे... 

मेरा प्यार ना 'रूठे' बस "दुआ" है मेरी! 

 

उसके साथ रहते-रहते हमे "चाहत" सी हो गयी...

उससे बात करते-करते हमे "आदत" सी हो गयी...

एक पल भी न मिले तो न जाने 'बेचैनी' सी रहती है...

दोस्ती निभाते-निभाते हमे "मोहब्बत" सी हो गयी!

 

मेरी 'वफ़ा' की "कदर" ना की...

अपनी "पसंद" पे तो 'ऐतबार' किया होता...

सुना है वो "उसकी" भी ना हुई...

मुझे 'छोड' दिया था उसे तो "अपना" लिया होता! 

 

पी है 'शराब' हर गली की "दुकान" से...

"दोस्ती" सी हो गयी है 'शराब की जाम' से...

गुज़रे है 'हम' कुछ ऐसे "मुकाम" से...

की आँखें "भर" आती है "मोहब्बत के नाम" से!

 

"फुर्सत" किसे है ज़ख्मों को 'सरहाने' की...

निगाहें "बदल" जाती है अपने 'बेगानों' की...

"तुम" भी "छोड़कर" चले गए हमें...

अब 'तमन्ना' न रही किसी से "दिल" लगाने की!

 

उन 'गलियों' से जब गुज़रे तो मंज़र "अजीब" था...

दर्द था मगर वो 'दिल' के "करीब" था...

जिसे "हम" ढूँढ़ते थे अपनी 'हाथों की लकीरों' में...

वो किसी दूसरे की 'किस्मत' किसी और का "नसीब" था!

 

मेरे 'दिल' में तेरे लिए "प्यार" आज भी है... 

माना कि "तुझे" मेरी "मोहब्बत" पर शक आज भी है...

नाव में बैठकर जो 'धोए' थे हाथ तूने...

पूरे "तालाब" में फैली 'मेंहदी की महक' आज भी है!

 

"तमाशा" न बना मेरी 'मोहब्बत' का...

कुछ तो "लिहाज़" कर 'अपने किए वादों' का! 

 

'पढ़' तो लिए है मगर अब कैसे 'फेंक' दूँ...

"खुशबू" तुम्हारे हाथों की इन 'कागज़ों' में जो है! 

 

"उदासी" तुम पे 'बीतेगी' तो तुम भी जान जाओगे कि...

कितना "दर्द" होता है 'नज़र अंदाज़' करने से!

 

"तुम" कई बार मिल चुके होते हमें...

अगर "तुम" जो मिलते 'दुआओं' से!

 

'सिलसिला' आज भी वो 'जारी' है...

"तेरा" हर ख्याल मेरी हर शाम पे 'भारी' है!

 

"तुम" तो अपनों के बीच में हमें "भूल" ही जाते हो...

लेकिन हम तुम्हे "भीड़" में भी "याद" करते हैं!

 

हमारे बारे में सिर्फ "हम" ही जानते हैं...

लोग तो सिर्फ "अन्दाजा" ही लगा सकते हैं!

 

कभी 'खफा' मत होना "हमसे"...

पता नहीं 'जिंदगी' कब तक साथ निभाएगी...

अगर "आप" भी हमसे "रूठ" जाओगे तो...

"मौत" 'जिंदगी' से "पहले" आ जाएगी!

 

"आपकी" कमी से 'मेरा दिल उदास' है...

पर 'मुझे' तो "आपसे" 'मिलने की आस' है...

"जख़्म" नहीं पर 'दर्द का एहसास' है...

ऐसा लगता है जैसे "दिल" का एक 'टुकड़ा' "आपके पास" है!

 

"तुम" भी अच्छे तुम्हारी "वफ़ा" भी अच्छी...

'बुरे' तो "हम" हैं...

जिनका 'दिल' नही लगता "तुम्हारे" बिना!

 

हमसे पूछा किसी ने?

'तुम' उसको "याद" क्यों करते हो...

जो 'तुम्हे' 'याद' ही नहीं करते...

तड़प कर "दिल" बोला...

'रिश्ते' निभाने वाले "मुकाबाला' नहीं करते!

 

कभी जो हम से 'प्यार' बेशुमार करते थे...

कभी जो हम पर "जान" निसार करते थे...

भरी 'महफ़िल' में हमको "बेवफा" कहते हैं...

जो "खुद" से ज़्यादा हम पर 'ऐतबार' करते थे! 

 

उसके 'चेहरे' पर इस क़दर "नूर" था...

कि उसकी याद में 'रोना' भी "मंज़ूर" था...

"बेवफा" भी नहीं कह सकते उसको ज़ालिम...

प्यार तो 'हमने' किया है वो तो "बेक़सूर" था! 

 

कितने 'मशरूफ' हैं हम "जिंदगी" की 'कशमकश' में... 

"इबादत" भी जल्दी में करते हैं फिर से "गुनाह" करने के लिए! 

 

यूँ तो 'आदत' नहीं मुझे 'मुड़' के देखने की तुम्हें देखा तो लगा कि... 

"एक बार" और देख लूँ! 

 

वो 'साथ' होते तो शायद "सुधर" भी जाते...

छोड़कर उसने हमें "आवारा" बना दिया! 

 

"खुदा" ने पूछा क्या 'सजा' दूँ उस 'बेवफा' को...

"दिल" से आवाज़ आई "मोहब्बत" हो जाये उसे भी!

 

एक कमी है उस 'पत्थर' में की वो कभी 'पिघलता' नहीं है...

पर उसकी एक "खूबी" भी है कि...

वो औरों की तरह "बदलता" नहीं है! 

 

वो क्या जाने "दर्द" की "कीमत" जो बात बात पे 'आँसू' बहाते है... 

उनसे पूँछो इसकी "कीमत" जो गम में भी 'मुस्कुराते' है! 

 

"फना" होने की "इज़ाजत" ली नहीं जाती... 

ये "वतन" की "मोहब्बत" है जनाब 'पूछ' कर नहीं किया जाता! 

 

ऐ "दिल" तू क्यों 'रोता' है ये आज की 'दुनिया' है... 

यहाँ 'ऐसा' ही होता है!

 

"खामोश" तुम्हारी 'नज़रों' ने एक काम 'गज़ब' का कर डाला... 

पहले थे हम "दिल" से 'तन्हा' अब 'ख़ुद' से ही 'तन्हा' कर डाला! 

 

उसके "दिल" में भी नजाने कितना 'दर्द' रहा होगा... 

जिसने इस "दर्द" का नाम "मोहब्बत" रखा होगा!  

 

चलो "दिल" की 'अदला-बदली' कर लें... 

"तड़प" क्या होती है 'समझ' जाओगे! 

 

"अजीब" सी 'पहेली' है इन हाथों की 'लकीरों' में... 

सफ़र लिखा है मगर "रास्ता" नहीं लिखा! 

 

इश्क "मोहब्ब्त" तो सब करते हैं...  

गम-ऐ-जुदाई से सब 'डरते' हैं... 

हम तो न "इश्क" करते हैं न "मोहब्ब्त"... 

हम तो बस 'आपकी' एक "मुस्कुराहट" पाने के लिए 'तरसते' हैं! 

 

किसी के "कह" देने से कोई "दिल" से चला जाता नहीं... 

"दिल" में झाँक कर देख लो कहीं वो 'रह' तो गए नहीं! 

 

"तू" रूठी-रूठी सी लगती है कोई 'तरकीब' बता "मनाने" की... 

मैं 'ज़िन्दगी' "गिरवी" रख दूंगा तू 'कीमत' बता "मुस्कुराने" की! 

 

कल रास्ते में "गम" मिल गया था...

लग के गले में 'रो' दिया... 

जो सिर्फ "मेरा" था सिर्फ "मेरा"... 

मेने उसे क्यों "खो" दिया! 

 

एक दिन "हम" भी "कफ़न ओढ़" जाएँगे… 

हर एक "रिश्ता" इस ज़मीन से "तोड़" जाएँगे... 

जितना जी चाहे "सता" लो यारों... 

एक दिन "रुलाते" हुए सबको छोड़ जाएँगे! 

 

"मोहब्बत" की रूहानियत 'ताउम्र' रहती है...

"तुम्हें" पढना "तुम्हें" सोचना... 

क्योंकि तुम्हें ही "लिखना" 'हक' है मेरा! 

 

मेरी अधूरी "ख़्वाहिश" बन कर न रह जाना "तुम"... 

दोबारा "जीने" का 'इरादा' नहीं रखते "हम"! 

 

ग़मों का एक तूफान "दिल" के अंदर 'शोर' करता है...

मगर हम तो "समुंदर" की तरह "ख़ामोश' रहते हैं... 

"सुराही" और "पैमाने" यहाँ काफ़ी नहीं होते...

ये वो "बस्ती" है जिस में दरिया-नोश रहते हैं! 

 

"नज़रें" मिलते ही 'दिल' लगाया नहीं जाता... 

हर मिलने वाले को अपना "बनाया" नहीं जाता... 

और जो 'दिल' में बस जाये एकबार...

उन्हें "उम्रभर" 'भुलाया' नहीं जाता!  

 

कभी कभी किसी की "आदत"... 

"मोहब्ब्त" से भी 'ज्यादा' हो जाती है!

 

"शिकायत" 'जिंदगी' से नहीं उनसे है... 

जो 'जिंदगी' में है पर "हमारे" नहीं हैं!

 

"दिल्लगी" थी नहीं तो 'ख़ैरियत' क्या पूछते... 

"मोहब्बत" थी जिसे 'सीने में दफ़्न' कर दिया!

 

"जिंदगी" में एक ऐसे "इंसान" का होना बहुत 'ज़रूरी' है... 

जिसको 'दिल' का हाल "बताने" के लिए... 

"शब्दों" की 'ज़रूरत' न पड़े! 

 

न समझ मैं "भूल" गया हूँ तुझे... 

तेरी खुशबू मेरे 'सांसो' में आज भी है...

मजबूरियों ने निभाने न दी "मोहब्बत"... 

सच्चाई मेरी "वफाओं" में आज भी है! 

 

टूट गया 'दिल' पर "अरमान" वही है...

दूर रहते हैं फिर भी "प्यार" वही है...

जानते हैं कि 'मिल' नहीं पायेंगे... 

फिर भी इन आँखों में 'इंतज़ार' वही है! 

 

"दिल" की बात "छुपाना" आता नहीं...

किसी का 'दिल' "दुखाना" आता नहीं...

आप सोचते है हम "भूल" गए आपको...

पर कुछ अच्छे 'दोस्तों' को "भूलना" हमको आता नहीं!