Hindi Suvichar on Life

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Hindi Suvichar on Life

Hindi Suvichar on Life

 

वो दिन कभी 'मत' दिखाना 'मेरे मालिक' ... 

कि मुझे 'अपने आप पर गुरुर' हो जाये! 

रखना मुझे इस तरह 'सब के दिलों' में ... 

कि हर कोई 'दुआ' देने को 'मजबूर' हो जाये! 

 

लाख टके की बात –  

कोई नही देगा साथ तेरा यहॉं ... 

हर कोई यहाँ खुद ही में मशगुल है ...

जिंदगी का बस एक ही उसूल है! 

तुझे 'गिरना भी खुद' है ...

और 'सम्हलना भी खुद' है! 

 

कभी 'पत्थर की ठोकर' से भी आती नहीं खरोच ...

कभी जरा सी बात से 'इन्सान बिखर' जाता है!

 

सच का भी अजीब ज़ायक़ा है ...

ख़ुद बोलो तो मीठा लगता है और ...

कोई दूसरा बोले तो कड़वा! 

 

'मीठे' लोगों से मिलकर मैंने जाना ...

'कड़वे' लोग 'अक्सर सच्चे' होते हैं!

 

बड़ो कि इज़्जत इसलिए करो, क्यूंकि ... 

उनकी अच्छाइयां हमसे ज़्यादा है! 

और छोटो से प्यार इसलिए करो, क्यूंकि ... 

उनके गुनाह हमसे कम है! 

 

जहा उसी का है जो मुस्कुराना जानता है ... 

रोशनी भी उसी की है जो 'शमा जलाना' जानता है! 

हर जगह 'मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे' हैं लेकिन ...

'ईश्वर' तो उसी का है जो 'सर झुकाना' जानता है! 

 

'वक़्त हँसाता' है 'वक़्त रुलाता' है ... 

'वक़्त' ही 'बहुत कुछ सिखाता' है! 

वक़्त की 'कीमत' जो पहचान ले वही 'मंज़िल' को पाता है ...

'खो' देता है जो वक़्त को 'जीवन भर पछताता' है ...

क्योंकि 'गुजरा हुआ वक़्त' कभी 'लौटकर' नहीं आता है! 

 

अच्छे व्यक्ति को समझने के लिए अच्छा हृदय चाहिये ...

न कि अच्छा दिमाग ... 

क्योंकि 'दिमाग' हमेशा 'तर्क' करेगा ...

और 'हृदय' हमेशा 'प्रेम--भाव' देखेगा!

 

'परमात्मा' की 'कारीगरी' तो देखो कितनी 'अजीब' है ...

हम 'सब' को बना कर खुद 'गायब' हो गया ...

'आंखे' बनाई देखने के लिये ...

पर वो दिखता 'बंद आंखों' से है! 

 

व्यक्ति की अच्छाई एक ऐसी लौ है जो ... 

छुप तो सकती है पर कभी बुझ नही सकती है!

 

दुनिया वो किताब है, जो कभी नहीं पढी़ जा सकती ... 

लेकिन जमाना वो उस्ताद है, जो सबकुछ सिखा देता है!

 

'फायदे के बगैर मदद' करना 'सीखें' ... 

जहाँ हमारा 'स्वार्थ समाप्त' होता है ...

वहीं से हमारी 'इंसानियत आरंभ' होती है! 

 

जरुरी नहीं है कुछ तोड़ने के लिए पत्थर ही मारा जाए...

अंदाज बदल के बोलने से भी बहोत कुछ टूट जाता है!

 

जुबां से बेबस हो जाता  है आदमी जब खुद पर गरूर हो जाता है...

टूटता है जब नशा दौलत का बहुत से रिशतों से दूर हो जाता है। 

 

रिश्तों का विश्वास टूट ना जाये...

दोस्ती का साथ कभी छूट ना जाये...

हे प्रभु गलती करने से पहले... संभाल लेना मुझे...

कहीं मेरी गलती से मेरा कोई अपना रूठ ना जाये। 

 

एहसासों की नमी बेहद जरुरी है हर रिश्ते में...

रेत भी सूखी हो तो हाथों से फिसल जाती है। 

 

"जीवन" में 'कड़वाहट' और 'मिठास' दोनों ही "महत्वपूर्ण" है...

'मिठास' हमें "खुशियां" देती है और ...

'कड़वाहट' उसी 'मिठास' को "संतुलित" करने का "काम" करती है। 

 

"खुबसूरत चेहरा" भी एक "दिन बूढा" हो जाता है...

'ताकतवर' "शरीर" भी एक "दिन ढल" जाता है! 

'ओहदा और पद' भी एक "दिन खतम" हो जाता है...

लेकिन एक "अच्छा इंसान" 'लोगों' के "दिलों" में "हमेशा जिंदा" रहता है!

 

जहां दूसरों को समझाना मुश्किल हो जाए वहां ...

खुद को समझा लेना बेहतर होता है। 

 

"खुशियाँ" आये "जिंदगी" में तो...

"चख" लेना "मिठाई" समझ कर... 

जब "गम" आये तो वो भी...

कभी "खा" लेना "दवाई" समझ कर। 

 

आँख से गिरा आँसूं और नज़रों से गिरा इन्सान...

कभी भी वापस अपनी पहले वाली जगह नहीं पाता।  

 

जिनकी संगत में ख़ामोश संवाद होते हैं...

अक्सर वो रिश्ते बहुत ही ख़ास होते हैं।  

 

दुनिया की सारी 'उलझनें' "खत्म" हो सकती है ...

अगर "बेईमान" 'खामोश' रहे ...

और "ईमानदार" 'बयां' करें।  

 

कभी कभी रिश्तों की कीमत वो लोग समझा देते है...

जिनसे हमारा कोई रिश्ता ही नहीं होता है। 

 

झूठ इसलिए बिक जाता है बाज़ार में क्योंकि...

सच को ख़रीदने की सबकी औक़ात नही।  

 

"सत्य" को "ख्वाहिश" होती है कि... सब उसे "जान" ले और... 

"झूठ" को हमेशा "डर" लगता है...कि... कोई उसे "पहचान" न ले।  

 

जो आपके हैं वो व्यस्त नहीं हो सकते और...

जो व्यस्त हैं वो आपके नहीं हो सकते।  

 

एक धागे की बात रखने को...

मोम का रोम रोम जलता है...

मजबूत रिश्ते टूट जाते हैं...

कच्चे धागे में प्यार पलता है!

 

लक्ष्य सही होना चाहिए साहब...

काम तो दीमक भी दिन-रात करती है पर...

वो निर्माण नहीं विनाश करती है!

 

कर्म के पास न काग़ज़ है...

न किताब है... 

फिर भी सारे जगत का हिसाब है!

 

जिनकी "हंसी" 'खूबसूरत' होती है,
उनके "जख्म" '
काफी गहरे' होते है। 

 

विचार 'गतिशील' व 'भिन्न' होते है...

इसका 'जीवंत' उदाहरण है...

सब्जी की 'टोकरी' में से हर व्यक्ति सब्जी 'छांटता' है...

और मजे की बात है कि 'बिक' भी पूरी जाती है!


 
"साझेदारी" करो तो 
किसी के "दर्द" की करो!

क्योंकि... "खुशियों" के तो "दावेदार" बहुत हैं!

 

पैर में से 'काँटा' निकल जाए तो...

चलने में 'मज़ा' आ जाता है ...

और मन में से 'अहंकार' निकल जाए तो ...

जीवन जीने में मज़ा आ जाता है ...

चलने वाले 'पैरों' में कितना फर्क है ...

एक आगे है तो एक पीछे पर ...

ना तो आगे वाले को 'अभिमान' है ...

और ना पीछे वाले का 'अपमान' क्योंकि ... 

उन्हें पता होता है ... 

कि पलभर में ये बदलने वाला है ...

इसी को "जिन्दगी" कहते हैं! 

'भाग्य' के साथ जितनी 'ज्यादा उम्मीद' करोगे ...

वो उतना ही 'निराश' करेगा...

'कर्म' पर जितना 'ज्यादा ध्यान' देंगे,

वो "उम्मीदों" से भी सदैव 'दुगुना' देगा!