Good Morning Shayari in Hindi with Image

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Good Morning Shayari in Hindi with Image

Good Morning Shayari in Hindi with Image

 

"हौसले" भी किसी 'हकीम' से कम नहीं होते हैं...  
हर 'तकलीफ़' में 'ताकत' की 'दवा' देते हैं!

 

"कीमत" दोनों की 'चुकानी' पड़ती है...
"बोलने" की भी और 'चुप' रहने की भी!

 

रिश्तों की "एहमियत" को समझें...
इन्हें 'जताया' नहीं 'निभाया' जाता है!

 

किसी ने मुझसे पूछा... 'वादे' और 'यादों' में क्या अन्तर है?
मैंने कहा वादे... 'इन्सान' तोड़ता है...
और यादें... 'इन्सान' को तोड़ती है!

 

नफ़रत 'कमाना' भी इस दुनिया में 'आसान' नहीं है...
लोगो की 'आँखों में खटकने' के लिए भी कुछ 'खूबियाँ' तो होनी चाहिये!

 

यूँ तो कई लोग 'लौटते' हैं हमारी 'जिंदगी' में 'अपने मतलब' के लिए...
और हम उन्हें 'अपना' समझते समझते सब कुछ 'हार' जाते हैं!

 

किसी ने क्या 'खूब' लिखा है "वक़्त" निकालकर...
"बातें" कर लिया करो अपनों से अगर...
अपने ही न रहेंगे तो "वक़्त" का क्या करोगे!

 

किसी को 'परेशान' देखकर अगर आपको 'तकलीफ' होती है...
तो यकीन मानिए...
'ईश्वर' ने आपको "इंसान" बनाकर कोई 'गलती' नहीं की है!

 

हर 'दर्द' की "दवा" है इस 'जमाने' में बस...
किसी के पास 'कीमत' नहीं तो किसी के पास 'किस्मत' नहीं!

 

किसी के लियें "रुकती नहीं"...
इतनी "मग़रूर" है 'ज़िन्दगी'...
"बदनाम" है "फिर भी" मगर... 
"मौत" से ज्यादा "मशहूर" है 'ज़िन्दगी'!

 

मँजिले बड़ी 'जिद्दी' होती हूं...
हासिल कहाँ "नसीब" से होती हैं!
मगर वहाँ 'तूफान' भी "हार" जाते हैं...
जहाँ 'कश्तियाँ जिद' पर होती हैं!

 

हवा के 'डर' से जो सहमा "उड़ान" से पहले...
वही 'ज़मीन पे गिरा' "इम्तिहान" से पहले!

 

बेजान चीज़ो को "बदनाम" करने के...
तरीके कितने आसान होते हैं...
लोग सुनते है 'छुप-छुप' के बातें...
और कहते है के 'दीवारों' को भी "कान" होते हैं!

 

प्यार में छोटी छोटी 'गलतियों: को "माफ़" कर देना चाहिये...
क्योंकि "गलती" तुम्हारी हो या उसकी 'रिश्ता' तो 'दोनों' का है!

 

"लोग डूबते" हैं तो 'समुंदर' को 'दोष' देते हैं...
मंजिल ना मिले तो किस्मत को 'दोष' देते हैं!
"खुद" तो 'सम्भल' कर चलते नहीं...
जब लगती है 'ठोकर' तब 'पत्थर' को 'दोष' देते हैं!
"जमाना" क्या कहेगा ये 'मत' सोचो...
क्योंकि ज़माना बहुत अजीब है!
"नाकामयाब" लोगो का 'मज़ाक' उड़ाता है...
और 'कामयाब' लोगो से 'जलता' है!
अगर लोग सिर्फ़ 'समझाने' से समझते तो...
"बांसुरी" बजाने वाला कभी "महाभारत" नहीं होने देता! 

 

मैं 'चलता' गया, 'रास्ते' मिलते गये...
राह के 'काँटे' 'फूल' बनकर 'खिलते' गये...
ये 'जादू' नहीं, 'कृपा' है मेरे 'राम' की...
वरना उसी 'राह' पर लाखों 'फिसलते' गये!

 

दिया जरूर 'जलाऊँगा' चाहे मुझे 'ईश्वर' मिले न मिले...
हो सकता है 'दीपक' की 'रोशनी' से किसी 'मुसाफिर' को 'ठोकर' न लगे!

 

लोग 'बुराई' करें और आप 'दुखी' हो जाओ...
लोग 'तारीफ' करें और आप 'सुखी' हो जाओ!
"मतलब" आपके 'सुख दुख' का 'चाबी' लोगों के हाथ में है...
कोशिश करें यह 'चाबी' आपके 'हाथ' में हो!

 

"ज़िन्दगी" में कभी किसी "बुरे दिन" से सामना हो जाये तो...
इतना "हौसला" जरूर रखना...
"दिन" बुरा था... "ज़िन्दगी" नहीं!

 

"लक्ष्मी" पुजे 'धन' मिले, "गुरू" को पुजे 'ज्ञान'...
"माँ - बाप" को पुजे 'सब' मिले, हो जाए 'कल्याण'!

 

माँ वह 'रोशनी' है, जो 'घर' पर साथ रह कर "रास्ता"दिखाती है...
पिता वह 'प्रकाश' है जो 'दुर' रह कर भी "अनुशासन" सिखाता है!

 

"'खुशी'" उड़ती हुई तितली के जैसी है...
जिसे पकड़ने के लिए आप जितना दौड़ेंगे ये...
उतना ही आपसे दूर चली जायेगी...
यदि आप शान्त मुद्रा मे एक जगह स्थिर हो जायेंगे तो...
ये खुद पे खुद आपके कंधे के पास बैठ जायेगी...
खुशी के पीछे मत भागो महसूस करो...
हँसते रहिये हँसाते रहिये सदा खुश रहिये!

 

माना 'कठिनाई' आने से 'आदमी' "अकेला" हो जाता है...
पर 'कठिनाई' आने पर ही "अकेला व्यक्ति"...
'मजबूत' होना 'सीख' जाता है!
शायद इसीलिए कहा गया है कि -
कभी 'टूटते' हैं तो कभी 'बिखरते' हैं...
"विपत्तियों" में 'इन्सान' ज्यादा 'निखरते' हैं!

 

हर 'इंसान का चरित्र' उसकी 'जुबान' के 'पीछे' "छुपा" हुआ है...
अगर उसे 'समझना' है तो उसे 'बोलने' दो!

 

बातों के "जख्म" बड़े 'गहरे' होते हैं...
'कत्ल' भी हो जाते हैं और 'खंजर' भी नही दिखते!

 

"पांव'" हौले से रख "कश्ती" से "उतरने" वाले...
"जिंदगी" अक्सर "किनारों" से ही "खिसका" करती है!

 

"दोस्त" वो होते हैं जिन्हें...
'मुश्किल वक़्त' में "ढूंढना" ना पड़े!

 

जैसे जैसे 'उम्र गुज़रती' है "अहसास" होने लगता है कि...
"माँ बाप" हर चीज़ के बारे में "सही" कहते थे!

 

"कमाई" हुई 'दौलत' साथ में नहीं आती...
"लेकिन"...
'दौलत' 'कमाने' के लिए अगर जो कोई "गुनाह" किया होगा*
वो "गुनाह" जरुर 'साथ' जाएगा!

 

पूरे 'संसार' में "ईश्वर" ने केवल 'इंसान' को ही...
"मुस्कुराने" का 'गुण' दिया है...
इस 'गुण' को "खोना" मत!

 

"आप" उन्हीं के लिए 'खास' हैं...
जिन्हे "आपसे" कुछ 'आस' है!

 

सवाल करने वाले तो 'बहुत' मिलते है लेकिन...
बिना 'सवाल' किये 'ख्याल' रखने वाले 'नसीब' से मिलते हैं!

 

अगर 'आप' "सुन्दर" दिखते हैं तो...
वो 'आप' के "माता पिता" की तरफ से 'गिफ्ट' है...
अगर 'आप सुन्दर तरीके' से जीते हैं तो...
वो 'आपकी' तरफ से उन्हें 'रिटर्न गिफ्ट' है!

 

दोष "कांटो" का कहाँ 'हमारा' है... "पैर" हमने रखा...
वो तो "अपनी जगह" पर था!

 

'शब्दों' का भी "तापमान" होता है,
ये "सुकून" भी देते हैं और "जला" भी देते हैं!

 

जो शेष 'बची' है उसे ही "विशेष" बनाइए...
बाद में तो "अवशेष" होना ही है!

 

सिर्फ़ "धो​खा" ही "शुद्ध" मिलता है...
इस "ज़माने" में बाक़ी तो 'सब' में "मिलावट" है!

 

"शीशा और रिश्ता" दोनों ही 'नाजुक' होते हैं...
पर दोनों में 'अंतर' यह है कि...
"शीशा" 'गलती' से "टूट" जाता है और...
"रिश्ता" "गलतफहमी" से!

 

"घाव" से नहीं 'लगाव' से 'डर' लगता है जनाब...
"लगाव" ना तो 'जीने' देता है और ना ही 'मरने' देता है!

 

"ढूढ़ना" ही है तो 'परवाह' करने वालों को 'ढूंढिये'...
"इस्तेमाल" करने वाले तो 'ख़ुद' ही आपको 'ढूंढ' लेंगे!

 

"वक़्त" के भी 'अजीब किस्से' हैं किसी का 'कटता' नहीं...
और किसी के 'पास' होता नहीं...
"वक़्त" दिखाई नहीं देता है पर बहुत कुछ 'दिखा' देता है...
अपनापन तो हर कोई दिखाता है...
पर "अपना" कौन है? ये 'वक़्त' दिखाता है!

 

किसको 'बर्दाश्त' है साहब 'तरक़्क़ी' आजकल दूसरों की...
लोग तो 'अर्थी की भीड़' देखकर भी 'जल' जाते हैं!

 

'विचारों' को "पढ़कर" 'बदलाव नहीं' आता है...
'विचारों' पर "चलकर" ही 'बदलाव' आता है!

 

दाम अक्सर 'ऊंचे' होते हैं 'ख़्वाहिशों' के...
मगर 'खुशियां' हरगिज़ 'महंगी' नहीं होती!

 

रब ही तो है जो ...
दिल की खामोशी भी सुन लेता है!

 

शरीर 'सुंदर हो या ना हो...
पर 'शब्दों' को जरूर सुंदर होना चाहिए...
क्योंकि लोग 'चेहरे भूल' जाते हैं...
पर 'शब्दों को नहीं' भूलते हैं!

 

अपनी "ताकत" पर जिसे 'नाज़' है उससे पूछो तो सही...
क्या अपना "जनाज़ा" वो 'खुद उठा' सकता है?

 

'रिश्ते और पतंग' जितनी 'उँचाई' पर होते हैं...
काटने वालो की 'संख्या' उतनी 'अधिक' होती हैं!

 

मरने वाले को 'रोने' वाले हजार मिल जायेंगे मगर...
जो 'जिंदा' है उसे 'समझने' वाला एक भी नही मिलता!

 

मदद करनी हो तो 'गैरों' की करो...
क्योंकि अपने अक्सर उसे 'फ़र्ज' का नाम दे देते हैं!